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Wednesday, June 16, 2010

किश्तों में तक्सीम होती "मैं".....

खामोश सूनी  चादर
दरमियान फ़ैल  गयी
"मेरे - तुम्हारे" के बेमानी  आयाम
बेवजह खींच  गयी
भीतर गहरे कहीं जडें जमाते  ,
भरभराते  हौसले ...
सिहरते मुस्तकबिल की पेशानी पर
चमकती बेचैन रातें ...
दिन के उजाले को स्याह करते अल्फाज़
जो लबों पर हैं सदियों से जमे ...
मुक्कमल तार्रुफ़ की आस में तड़पती
रिश्तों की बानगी
अनगिनत टुकड़ों में बँटे जज़्बात
और कहीं किश्तों में  तक्सीम होती "मैं"...
posted by Reetika at 6/16/2010 04:07:00 AM 27 comments

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