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Monday, February 23, 2009

मन का खेला....

जो रंग मन को भाता
खुशियों को उसी में रंग जाता
चम्पई पीला
या गहरा नीला
सब है मन का खेला
महकता रजनीगंधा
या खिलता बेला
होता सिर्फ़ आभास उसका
जो दिल पर बीछा रहता
मुस्कराहट में छिपा
एक अलग ही मौसम
सुबह के धुन्दल्के में
यूँ ही भिगो जाता
लो लौट आया फ़िर से
इक जीने का बहाना
कच्चा पक्का एक नया ही रंग
हौंसलों पे मेरे छा गया

posted by Reetika at 2/23/2009 05:44:00 PM

9 Comments:

रीतिका जी ,
जीवन में इतने ढेर सारे रंग हमें देखने पड़ते हैं
कब कौन किस रंग में रंग जाये ,क्या पता ..अच्छी कविता .
हेमंत कुमार

February 25, 2009 2:37 AM  

Reetika ji,
bahut sundar bhavpoorn kavita.badhai.
Poonam

March 03, 2009 2:17 AM  

जो रंग मन को भाता है,खुशियों को उसमे रंग जाता है..कविता सुन्दर लगी ...लिखते रहे ...

March 22, 2009 2:02 AM  

एक रंग की कामना मीरा ने भी की थी /

March 24, 2009 1:54 AM  

लो लौट आया फ़िर से
इक जीने का बहाना
कच्चा पक्का एक नया ही रंग
हौंसलों पे मेरे छा गया..........मैंने जाना है.....कि बेशक दुनिया चाहे जैसी भी क्यूँ ना हो जाए....और कितने ही रिश्ते कितने ही कड़वे क्यूँ ना हो जाएँ....मगर विश्वास इक ऐसी चीज़ है....कि आदमी बार रिश्ते बनाता है...और सच बताऊँ....वो जीत ही जाता है...अंततः रिश्ते ही उसके विश्वास का आधार या उसका संबल बनते हैं....सच....!!
हाँ सच....जिन्दगी में इसी तरह बार-बार लौटते हौसलों से ही जिन्दगी बार-बार संवरती है....बनती है....!!

April 04, 2009 12:32 PM  

@ Hemant , Poonam and Abhivyakti... Shukriya hausla-afzai ke liye...

@ Brijmohan..beshaq ek rang Meera ke prem ka bhi tha jisko samajhna aaj ki duniya mein kisi ke bas ka nahi hai..

@ Bhootnath.. shayad isi vishwaas ka sahara aage le chale..

April 05, 2009 7:17 PM  

ending bahut hi umdaa hai is umda kavita kii :)

April 10, 2009 3:13 PM  

@ Pyasa Sajal.. bahut bahut shukriya..

April 11, 2009 2:11 AM  

This comment has been removed by the author.

April 11, 2009 2:11 AM  

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