UnxploreDimensions...

Saturday, April 10, 2010

एक बार फिर ...

क्यूँ आसमान का हर टुकड़ा
अपना सा लगता है
जहाँ भी लगे धरती पर झुकता
ज़िन्दगी का पूरा सच लगता है
मन के सीले अंधेरों को जगमगाती
उमीदों की चमकीली रौशनी
क्यूँ सुर्ख हो जाती सपनो की
बदरंग दुनिया अनोखी
सिर्फ इक हंसी की झड़ी
कर देती ...
एहसासों की ज़मीं गीली
इक नया अरमां होने लगता
हर पल पर काबिज़
क्यूँ हो जाता एक बार फिर से एतबार 
हो कर दिल से  आजिज़  ...
posted by Reetika at 4/10/2010 02:33:00 AM

11 Comments:

khoob soorat...

http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

April 10, 2010 3:06 AM  

बहुत बढ़िया लिखा है.

April 10, 2010 10:09 AM  

क्यूँ हो जाता एक बार फिर से एतबार
हो कर दिल से आजिज़ ...Ye to bahut achchi aur pyaari baat hai Reetika! aitbaar hai kyonki ummeed hai...aur ummeed hi zindgi.

April 10, 2010 9:52 PM  

सुंदर रचना।

April 10, 2010 9:57 PM  

जहाँ भी लगे धरती पर झुकता
ज़िन्दगी का पूरा सच लगता है

बहुत गहरी बात कह दी इन दो पंक्तियों में .....!!

April 10, 2010 10:49 PM  

@ Sameer - Dhanyawaad!
@ Dileep - shukriya tareefkarne ke liye
@ Priya - Etbaar kar ke bhi ab man bhar gaya hai..

April 10, 2010 11:40 PM  

@ Anjana - Thanx

April 10, 2010 11:41 PM  

@ Harkeerat - shayad is ek sach se hi duniya chal rahi hai..

April 11, 2010 12:12 AM  

" bahut hi badhiya lekhanne ..aapki lekhani ko salam aur is khubasurat rachana ke liye aapko dhero badhai "

----- eksacchai { AAWAZ }

http://eksacchai.blogspot.com

April 11, 2010 3:37 AM  

क्यूँ आसमान का हर टुकड़ा
अपना सा लगता है
जहाँ भी लगे धरती पर झुकता
ज़िन्दगी का पूरा सच लगता है
मन के सीले अंधेरों को जगमगाती
उमीदों की चमकीली रौशनी
क्यूँ सुर्ख हो जाती सपनो की रीतिका जी, आपकी इस कविता में भी संवेदनाओं का प्रकृति के साथ बेहतरीन तादात्म्य स्थापित किया गया है। अच्छी लगी आपकी रचना।

April 11, 2010 11:40 PM  

बहुत गहरी बात कह दी इन दो पंक्तियों में ...

April 13, 2010 11:35 AM  

Post a Comment

<< Home

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape Text selection Lock by Hindi Blog Tips